Sunday, November 29, 2009

गणेश

इनकी चार भुजाएं
ये लंबी सूंड
इत्ता भारी पेट
चलते होंगे किस तरह
आले में बैठे हैं
धूल के बीच ।
मैंने उससे पूछा
वह आंसू टपकाती रही
अतीत में रही किसी व्यथा से
अपनी करूणा में ।
अंधेरे में उसे टटोलते
मुझे अचानक लगा
यह अंगुली उसकी नहीं
अगरबत्ती के किसी कारखाने से
अभी कुछ देर पहले लौटी
एक औरत की है
जो मुझे एक बिलात दूर सोई
अब हिचकियां लेने लगी ।
सूंड और दो पैर उठाए
मैं हाथी था अपनी हताशा में
चिंघाड़ता पूरा जंगल था
उस रात सन्नाटे में
फटकारे जा रहे असंख्य सूप
दिशाओं में उड़ रहा धान ।
हवाओं की चादर तनी थी
समेट रही करोड़ों अंगुलियां
भरे थर पस के पस
भूसे बगदे बालियों से घिरा मैं ।
मुंह ढांपे एक
गरीब सपना था
मेरी चारपाई पर ।
झुर्रियोंदार अंतरिक्ष तक
फटा प़ड़ा था
भूख का पेट ।
नृत्य करते मोदक बांद आए
हारे थके उसके आले में अब
आ बैठs गणेश ।
मैं रोज़ अगरबत्ती सा
सुलगता हूं
उसकी फटी बिवाई वाली आंखों में ।

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