Sunday, November 29, 2009

देह का संगीत

वह अंतिम बार
मेरे सीने से लगी
सर्द रातें
साये के बिना बारिश
तपती धूप में
वह याद आई ।
मुझे सुन रही होगी
इस वक्त भी
किसी के सीने से सटी
मैं सितार नहीं
सरोद नहीं
सारंगी नहीं
बंसी नहीं
फिर भी
बजने से पहले
अनंत तक उसके लिए
देह मचलती रही ।
00
ढेरों काम

ढेरों काम
पड़े हैं उसके पास
टी वी देखना
स्वेटर बुनना
तीसरी मंजिल तक
पानी की बाल्टी पर
बाल्टी बन हांफना
कविता सुनने की
उसे फुर्सत नहीं ।
उसने सबक रटा
एक मेमने के
गले में
बस्ता लटकाया
कंकरीली सड़क पर
निकल गई ।
मुझे छोड़ गई
दाल में करछुली
हिलान को ।
अब सोच रहा प्याज
कतरते हुए
उसके पैर में
चप्पल डाली कि नहीं ।
O

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