
Sunday, September 12, 2010
Thursday, September 2, 2010
Wednesday, August 4, 2010
अखिल ब्रह्मांडीय सौदर्य स्पर्द्धाओं की नहीं वह मोहताज
मैं कवि हूं
कल्पना करने का
वाल्मीकी,तुलसी,कबीर,सूर
मीरा,रैदास,मीर तकी मीर,गालिब के
जमाने से मेरा हक बनता है।
कल्पना करने का
वाल्मीकी,तुलसी,कबीर,सूर
मीरा,रैदास,मीर तकी मीर,गालिब के
जमाने से मेरा हक बनता है।
सदियों से स्त्रियों के चेहरे की
तुलना चांद से
की जाती रही है
लेकिन मैं उन तमाम परिकल्पनाओं को
ध्वस्त करता हुआ कहता हूं
आसमान में चांद नहीं सिर्फ
अकेली तू है
अपनी नादानियों बचकानी
हरकतों,कम तनख्वाह में घर भर का
पेट भरने की दिक्कतों
रोजमर्मा की तकलीफों के साथ
मुझे नज़र नहीं आता
बादलों की ओट में ढंका
जद्दोजहद के बाद उभरता
तुलना चांद से
की जाती रही है
लेकिन मैं उन तमाम परिकल्पनाओं को
ध्वस्त करता हुआ कहता हूं
आसमान में चांद नहीं सिर्फ
अकेली तू है
अपनी नादानियों बचकानी
हरकतों,कम तनख्वाह में घर भर का
पेट भरने की दिक्कतों
रोजमर्मा की तकलीफों के साथ
मुझे नज़र नहीं आता
बादलों की ओट में ढंका
जद्दोजहद के बाद उभरता
चांद कहां है
सिर्फ तू ही तू है तू...
तेरे गाल से ओंठ पर होती
अनंत तक जाती
काले कजरारे बादल की इक
दुबली पतली नन्हीं सी रेख ।
कितने दृश्य बदलता है
तेरा चेहरा
टैलकम,लिपिस्टिक,बिंदिया
तू किसी अखिल ब्रह्माण्डीय
सौंदर्य स्पर्द्धा की कब रही मोहताज
तूने नहीं ली किसी मोनालिसा से
उधारी में मुस्कान
जानेमन क्लियोपेटा
तेरे घर का पानी भरे ।
और क्या कहूं
मैं नाचीज इसके आगे ...।
सिर्फ तू ही तू है तू...
तेरे गाल से ओंठ पर होती
अनंत तक जाती
काले कजरारे बादल की इक
दुबली पतली नन्हीं सी रेख ।
कितने दृश्य बदलता है
तेरा चेहरा
टैलकम,लिपिस्टिक,बिंदिया
तू किसी अखिल ब्रह्माण्डीय
सौंदर्य स्पर्द्धा की कब रही मोहताज
तूने नहीं ली किसी मोनालिसा से
उधारी में मुस्कान
जानेमन क्लियोपेटा
तेरे घर का पानी भरे ।
और क्या कहूं
मैं नाचीज इसके आगे ...।
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